अब नया कौटिल्य कोई देश हित में ढूंढ लायें,
स्वर्ग सी सुंदर मनोहर निज धरा को हम बनायें ।
एकता पनपे जगत में हो व्यवस्था इस तरह की,
न्याय प्रिय शासक चलो हम राज गद्दी पर बिठायें।
लोक हित की योजनाएं पा सकें आधार भू पर,
रोग भ्रष्टाचार का हम शीघ्र ही जग से मिटायें।
पा सकें सम्मान सेवक राष्ट्र के सच्चे सिपाही,
श्रेष्ठता की कर प्रशंसा हम मनोबल को बढ़ायें।
योग्य हो यदि पथ प्रदर्शक मार्ग मिलते हैं प्रगति के,
बन चतुर साथी सहज हम कंटकों पर जीत पायें।
– मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
