नयन नीर जिस जन को लगता,प्यारा है,
वहीं जगत के दृग का बनता, तारा है।
सूख गया है जिसकी आंखों, का पानी,
अपनों का अधिकार उसी ने, मारा है।
देश और परिवार उसी को, चाहेगा ,
आन बान पर जिसने तन-मन, वारा है।
ज्ञात जिसे होतीं हैं अपनी, सीमाएं,
नहीं भटकती उसकी जीवन, धारा है।
आदर देकर आदर पाना, सीखा जो ,
देता उसको अपनापन जग, सारा है ।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
