गीतिका – मधु शुक्ला

 

प्रबल विरोधी, हों जब अपने ,

तय तब होते , कंटक मिलने।

 

कठिन परीक्षा, जीवन लगता,

जब लग जाते , रक्षक डसने।

 

नरक हमारा , जीवन बनता,

गृह जब आते , हैं छल गहने।

 

विमल विचारों, के उपवन में,

कुसुम लगे हैं, कृत्रिम दिखने।

 

मनन करें क्यों, व्याकुल उर हैं,

हृदय लगे क्यों, तेज धड़कने।

— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश

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