कष्ट देता है हृदय को युद्ध का विस्तार,
क्यों प्रगति सिखला रही है छीनना अधिकार।
आपसी सहयोग चाहें मानवी संबंध,
सत्य यह गहकर चला है सर्वदा संसार।
श्रेष्ठता की दौड़ से हैरान है भगवान,
क्या नियंत्रित कर लिया मानव समय की धार।
प्रेम,अपनापन मिले तो व्यक्ति पाता हर्ष,
क्यों बढ़ावा पा रहा फिर द्वेषमय व्यवहार।
तज अहम संवेदना को हम बना लें मीत ,
भू पटल पर फिर न होगा युद्ध का तब भार।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
