गीतिका – मधु शुक्ला

 

जब – जब सूर्य ताप ,बरसाता,

मनुज अपार कष्ट, दुख पाता।

 

सतत प्रचंड ताप , दुख बाँटे ,

बचत उपाय ज्ञान, न सुझाता।

 

यदि हम सृष्टि नीति, अपनाते ,

न ऋतु विरोध आज, गहराता।

 

प्रतिदिन भूमि वृक्ष , नव मांँगे,

पर न विवेक बात , यह ध्याता।

 

अगर सुधार आप , ऋतु चाहें ,

प्रकृति दुलार सूत्र , प्रिय भ्राता।

— मधु शुक्ला, सतना , मध्यप्रदेश

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