सभी को साथ चलना अब जरूरी हो गया है ।
सपोलों को कुचलना अब जरूरी हो गया है ।
सभी अहसास जम पत्थर हुए हैं आज भाई ,
शिलाओं का पिघलना अब जरूरी हो गया है ।
हमारी खामियां भारी पड़ीं हैं आज हम पर ,
हमें पथ को बदलना अब जरूरी हो गया है ।
अहिंसा ने हमेशा देश को धोखा दिया है ,
दरिंदों को निगलना अब जरूरी हो गया है ।
बिना संगीन के रक्षित नहीं होती अहिंसा ,
सुरक्षा दीप जलना अब जरूरी हो गया है ।
सभी अब इस बुरे हालात से उकता चुके हैं ,
पड़ोसी का दहलना अब जरूरी हो गया है ।
तरक्की से हमारी चिढ़ रहे सारे पड़ोसी,
हमें भी उनको छलना अब जरूरी हो गया है ।
बगावत की कहानी आज गलियां कह रही हैं,
लहू “हलधर” उबलना अब जरूरी हो गया है ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
