राही सभी थक कर गिरे , चलती रहीं पगडंडियां ।
खलिहान ही उजड़े मिले ,महकी मिलीं सब मंडियां ।
जो काम उत्तम था कभी क्यों लाभ से वंचित हुआ ,
क्यों आत्म हत्या हो रहीं बोलीं चिता की कंडियां ।
कुछ लोग पीछे रह गए कुछ दौड़ कर आगे बढ़े ,
कुछ झोपड़ी कोठी बनी कुछ हो गयीं वनखंडियां ।
निर्जल मरुस्थल में शहर रोती मिली यमुना नदी ,
वातानुकूलित होटलों में थिरकती अब संडियां ।
अब नग्नता हावी हुई देखो कला के नाम ,
फिल्मी सितारा बन गयी हैं कुछ विदेशी गुंडियां ।
अब निर्भया जैसा न हो इस बात पर भी ध्यान दो ,
बेटे बनाओ देवता या बेटियों को चंडियां ।
हैं जिंदगी के चार दिन मानव नहीं समझा कभी ,
अर्थी बनेगी बांस की चांदी न सोना डंडियां ।
हो भावना में लीन “हलधर”कह गए ऐसी ग़ज़ल ,
सबका वरण करता मरण चांडाल हो या पंडियां ।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
