ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

 

आग में अब घी मिलना छोड़ दे ।

दूसरों के घर जलाना छोड़ दे ।

 

हो गया बर्बाद तू इस शौक में ,

बेवज़ह लड़ना लड़ाना छोड़ दे ।

 

अन्न सारा बंद क्यों गोदाम में ,

कुछ परिंदों को भी दाना छोड़ दे ।

 

जेब खर्चे के लिए कुछ काम कर ,

बाप के पैसे उड़ाने छोड़ दे ।

 

डोर जिनकी काट देती गर्दनें,

उन पतंगों को उड़ाना छोड़ दे ।

 

जो बुलंदी दूर अपनों से करे,

आसमानी वो ठिकाना छोड़ दे ।

 

पास आएंगी नहीं बदनामियां,

जालसाजी का घराना छोड़ दे ।

 

आंसुओं की झील सी आँखें हुईं,

प्रेम का किस्सा पुराना छोड़ दे ।

 

मंच को बेचैन ‘हलधर’ है बहुत ,

शांति का झूठा बहाना छोड़ दे ।

– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

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