आग में अब घी मिलना छोड़ दे ।
दूसरों के घर जलाना छोड़ दे ।
हो गया बर्बाद तू इस शौक में ,
बेवज़ह लड़ना लड़ाना छोड़ दे ।
अन्न सारा बंद क्यों गोदाम में ,
कुछ परिंदों को भी दाना छोड़ दे ।
जेब खर्चे के लिए कुछ काम कर ,
बाप के पैसे उड़ाने छोड़ दे ।
डोर जिनकी काट देती गर्दनें,
उन पतंगों को उड़ाना छोड़ दे ।
जो बुलंदी दूर अपनों से करे,
आसमानी वो ठिकाना छोड़ दे ।
पास आएंगी नहीं बदनामियां,
जालसाजी का घराना छोड़ दे ।
आंसुओं की झील सी आँखें हुईं,
प्रेम का किस्सा पुराना छोड़ दे ।
मंच को बेचैन ‘हलधर’ है बहुत ,
शांति का झूठा बहाना छोड़ दे ।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
