ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

 

हड्डियों का जाल है ये कारखाना जिस्म का ।

चंद सांसों पर टिका है वारदाना जिस्म का ।

 

जान आदम की बचाने में जुटी चारागरी ,

मौत को मालूम है अंतिम ठिकाना जिस्म का ।

 

सिंधु को भी दर्द होता है मगर कहता नहीं ,

खा रहे हम लूटकर उसका खज़ाना जिस्म का ,

 

एक दिन मिलना सभी को राख़ में या ख़ाक में ,

ज़िंदगी क्या छोड़ती सजना सजाना जिस्म का ।

 

सूत कितना कातना है शेष कितनी है रूई ,

कौन जाने किस समय टूटे ये ताना जिस्म का ।

 

क़ामयाबी के नशे में चूर क्यों ‘हलधर’ हुआ ,

वक्त के हाथों में बंदी है घराना जिस्म का ।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *