हड्डियों का जाल है ये कारखाना जिस्म का ।
चंद सांसों पर टिका है वारदाना जिस्म का ।
जान आदम की बचाने में जुटी चारागरी ,
मौत को मालूम है अंतिम ठिकाना जिस्म का ।
सिंधु को भी दर्द होता है मगर कहता नहीं ,
खा रहे हम लूटकर उसका खज़ाना जिस्म का ,
एक दिन मिलना सभी को राख़ में या ख़ाक में ,
ज़िंदगी क्या छोड़ती सजना सजाना जिस्म का ।
सूत कितना कातना है शेष कितनी है रूई ,
कौन जाने किस समय टूटे ये ताना जिस्म का ।
क़ामयाबी के नशे में चूर क्यों ‘हलधर’ हुआ ,
वक्त के हाथों में बंदी है घराना जिस्म का ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
