योग साधना सरल नहीं है, मन का पंछी चंचल है ।
काम कठिन काबू में रखना ,कोशिश जारी हर पल है ।
जिंदा लोगों की दुनिया में ,मुर्दों को तादात बढ़ी ,
बेशक होंठ सिले हों मेरे ,अंदर काफ़ी हलचल है ।
जीवन इतना सरल नहीं है ,जैसा मान लिया हमने ,
ऊपर से पत्थर जैसा है , नीचे इसके दलदल है ।
मुश्किल चाहे लाख खड़ी हों ,कोशिश ज़ारी रखनी है ,
ऊबड़ खाबड़ राहों से, आगे का रस्ता समतल है ।
आग लगी जंगल में जिस दिन ,मेघ बुझाने आए थे ,
सरकारी फाइल में अब क्यों ,दौड़ रही ये दमकल है ।
उसे मुरादाबादी कहकर, संबोधित मत कर देना ,
उसका जिला कागजातों में ,शहर सुहाना सम्भल है ।
गहना गांव निवासी “हलधर”, कवि शायर दीवाना है ,
छोटी काशी में गंगा की, धारा बहती कलकल है ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
