ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

 

योग साधना सरल नहीं है, मन का पंछी चंचल है ।

काम कठिन काबू में रखना ,कोशिश जारी हर पल है ।

 

जिंदा लोगों की दुनिया में ,मुर्दों को तादात बढ़ी ,

बेशक होंठ सिले हों मेरे ,अंदर काफ़ी हलचल है ।

 

जीवन इतना सरल नहीं है ,जैसा मान लिया हमने ,

ऊपर से पत्थर जैसा है , नीचे इसके दलदल है ।

 

मुश्किल चाहे लाख खड़ी हों ,कोशिश ज़ारी रखनी है ,

ऊबड़ खाबड़ राहों से, आगे का रस्ता समतल है ।

 

आग लगी जंगल में जिस दिन ,मेघ बुझाने आए थे ,

सरकारी फाइल में अब क्यों ,दौड़ रही ये दमकल है ।

 

उसे मुरादाबादी कहकर, संबोधित मत कर देना ,

उसका जिला कागजातों में ,शहर सुहाना सम्भल है ।

 

गहना गांव निवासी “हलधर”, कवि शायर दीवाना है ,

छोटी काशी में गंगा की, धारा बहती कलकल है ।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

 

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