इबादत जिंदगी का पासबाँ है,
फँसे संकट निकलने की दुआ है।
मिले हमको बिसाले यार तुम क्यो?
लगे किस्मत ने हमको अब छला है।
जरा छोड़ो हमारी तिश्नगी को,
हमारी तिश्नगी ने ग़म पिया है।
रहे हम तड़फते जिंदगी मे,
ग़मो को आज हमने खुद पिया है।
सदा खाकसारी मे जियो तुम,
मिले आशीष तुमको ये हुआ है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
