वतन पर जान मैं दे दूँ,यही पैगाम हो जाए,
फिदा कर दूँ वतन पर आज मेरा नाम हो जाए।
सुनो ये चाँद सा चेहरा जो देखूँ शाम हो जाए,
कभी तो आस्मां से चाँद उतरे जाम हो जाए।
हुआ सूना ये मन कौना,तुम्हे कान्हा पुकारेगे,
तेरे दर पे सदा मेरी सुबह से शाम हो जाए।
जुदाई भी सहूँ कैसे,मजा क्या दिल दुखाने मे,
तुम्हारे प्यार मे जाना,कही गुमनाम हो जाए।
कहाँ ढूँढू सुकूँ अपना,नही समझी अदा तेरी,
चले आओ,मेरी बाँहो मे,जरा आराम हो जाए।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
