मुफलिसो मे लोग जीते ले नमी कैसे कहूँ।
आँख मे आँसू भरे हैं फिर हँसी कैसे कहूँ।
सजदे मैने अब कियें हैं,वो निशां थे आपके।
दिल मे उठते इस धुँए को आशिकी कैसे कहूँ।
ये लगा सारा जहाँ कदमों मे मेरे आ गया।
अब तड़फता फिर रहा हूँ दिल्लगी कैसे कहूँ।
रास्ता मुश्किल भले हो आदमी डरता नही।
दर्द सहता है भले जीता कमी कैसे कहूँ।
देखता हरदम रहा तू आ छतो पर,बात कर।
दिल जो जोड़ा,बात कर तू,आशिकी कैसे कहूँ।
दर्द हमने वो सहे जो वक्त ने हमको दिये।
बन तू कुंदन यार मेरे बेबसी कैसे कहूँ।
जिंदगी का *ऋतु सफर ये अब कहाँ इतना सरल।
ठोकरे खाकर सम्भलती, मैं डरी कैसे कहूँ।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
