प्यार के सिलसिले हो गये,
बेवजह फासले हो गये।
इश्क लगता फरेबी बड़ा,
घाव फिर से हरे हो गये।
बिन मिले वो जुदा है अब,
गाल भी अनछुए हो गये।
इश्क तेरा बड़ा दर्द दे,
यार हम दर्द मे हो गये।
सात जन्मों का अब साथ है,
गैर कैसे भला हो गये।
मुख्तलिफ गम छिपाते रहे,
फिर कैसे बेवफा हो गये।
चाहतों को न बुलबुला समझ,
हम दिवाने तेरे हो गये।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
