ऐसा है मेरा यार,मै तकरार क्या करूँ?
तू बेवफा है तुझसे भला प्यार क्या करूँ?
पलके झुका ली मैने कि इज़हार क्या लिखूँ,
नाकाम मोहब्बत पे मैं यल़गार क्या लिखूँ।
तुम जिंदगी मे आज हुकूमत बड़ा किये,
समझा मुझे लाचार कि एतबार क्या करूँ।
डूबे हो मेरे इश्क मे खुर्शीद हो गये,
आया हूँ यार दर पे मैं इंकार क्या करूँ।
होगा भला भी क्या मैं बना तलबगार हूँ,
दे दे जकात प्यार की दिलदार क्या करूँ।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
