ग़ज़ल – रीता गुलाटी

देते  दुआ है सबको लब पे हँसी  लिखी हो,

ए काश ग़म़ न आए, बस मस्ती लिखी हो।

 

क्यों चाँद आज हमको आँखें बड़ी दिखाएँ,

किस्मत में यार जिसके ये चाँदनी लिखी हो।

 

यूँ वक्त भी हमे क्यो देता ये सिसकियाँ है,

रोते हैं रात भर हम शायद नमी लिखी हो।

 

आँखो मे अब बसी है तस्वीर यार तेरी,

किस्मत से आज ऐसी ये दोस्ती लिखी हो।

 

कहते सभी हमे भी रखना ख्याल सबका,

ले लो दुआएं उनकी नेकी भली लिखी हो।

 

रोते  हैं  आज बूढें  बैठे हुऐ अकेले,

किस्मत मे जिसके आखिर ये बेबसी लिखी हो।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

 

 

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