जो देखा ख्याब पूरा सा नही है।
जो सोचा यार सच्चा सा नही है।
मिलेगा प्यार तेरा यार ये जमता नही है।
मुझे इस बात का शिकवा नही है।
लगे जन्नत हमें भी आशिकी ये।
मगर ये हुस्ने-ए-जाना नही है।
गरीबी मे सिले है होठ उनके।
मगर लब से वो कुछ कहता नही है।
वही मंजिल को पा लेता है अपनी।
जो तूफानों मे रूकता नही है।
रहोगे यार कैसे बिन हमारे।
बिना मेरे कहाँ जँचता नही है।
दिया जो प्यार तूने अब हमे वो।
किसी दूजे को वो दिखता नही है।
छुपी है कोई चिंगारी तो दिल मे।
धुँआ बिन आग के उठता नही है।
रहेगे संग हरदम प्यार से हम।
तुम्हारे बिन ये दिल लगता नही है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
