दे चुके बेटी खानदानी को।
हम न भूलेगें अपनी रानी को।
आज रोकेगे इस कहानी को।
इश्क मे बढ़ती इस रवानी को।
कर गये कुछ गुनाह अंजाने।
हो गया सब बड़ा नादानी में।
कर रहा था सितम जमाने के।
आज रोकूँ मैं बदगुमानी को।
तुम सताते रहे बिना समझे।
अब कहाँ सुन रहे जुबानी को।
अब कहाँ कौन चाहता खेती।
भूल बैठे सभी किसानी को
याद करती बड़ा वो नातिन को।
वो न आयी सताऐ नानी को।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
