क्यो चेहरा आज उखडा सा हुआ है।
लगा जो तीर छलनी सा हुआ है।
अदाएं यार हमको है लुभाती।
ये दिल मेरा भी दीवाना हुआ है।
लड़े है लोग आपस मे अजी क्यो?
कहाँ कोई यहां अपना हुआ है।
उमस फैली यहां पर बहुत देखी।
मगर मोसम सुहाना सा हुआ है।
छिडी है जंग धर्मो मे बड़ी अब
यहां माहौल ज़हरीला हुआ है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
