रिश्तों से अंजान नही है।
ऩज़रो मे सम्मान नही है।
दुख देता जो अपनो को।
लगता वो इंसान नही है।
दुख सहकर वो चुप रह जाता।
इंसा है वो सामान नही है।
काटो वक्त खुशी से अब तुम।
जीना भी आसान नही है।
क्या रहना है उस घर मे।
जिस घर मे भगवान नही है।
खोया तेरी यादो मे मैं,
तुझसे बढ़कर जान नही है।
अनपढ़ रहता जो जीवन मे।
पाता जग पहचान नही है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
