प्यार की अब तलाश करेगा क्या,
है मुहब्बत तभी जलेगा क्या।
सुनके मेरी ग़जल वो रोता है,
दर्द भीतर बड़ा सहेगा क्या।
रात दिन यार ने तराशा भी,
फिर नही खोट यूँ मिलेगा क्या।
आँख मेरी बनी है मुंतजिर भी,
साथ फिर तू अब रहेगा क्या।
जिस्म मे दिल था ख्याब भी देखे,
इसको छाना गया पायेगा क्या।
आज शिकवा किसी से क्या करती,
जानकर यार भी बिछुड़ेगा क्या।
हाथ पकड़ा सदा निभाएगा क्या,
साथ मंजिल तलक चलेगा क्या
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
