साथ तेरा भी गुलजार सा हो गया,
दिल मेरा यार लाचार सा हो गया।
प्यार फूलों सा महका बड़ा रात भर,
नींद आना भी दुश्वार सा हो गया।
हम गमों को सहे, दूसरो के लिये,
जब मिले आपसे प्यार सा हो गया।
प्यार बढ़ता रहा इक सदी की तरह,
सामने यार लाचार सा हो गया।
चाँद से जब मिली चाँदनी रात को.
चाँद का आज अधिकार सा हो गया।
रात दिन आज देखें सभी फोन मे.
खो रहा आँख बेकार सा हो गया।
बात सुनता कहाँ आज परिवार मे,
खुद को समझे है भरतार सा हो गया।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
