अब सजी महफिल हमारी शान है,
हाथ खाली क्यो नही अब जाम है।
हम खड़े मंदिर अनोखी शाम है,
साथ मे मेरे प्रभु श्री राम है।
आज खुशियों से भरी ये शाम है,
जिंदगी जिंदा दिली का नाम है।
प्रेम आँखो से जताना अब जरा,
प्रेम को हद से निभाना काम है।
दूर रहना छल कपट से तू जरा,
छल से ही परेशान अब आवाम है।
जिंदगी मे मेरी तुम आ गये,
जब मिले मुझसे लगा आराम है।
है कहाँ पसन्द सभी के साथ मे,
अब बना रस्ते नये पैगाम है।
बीच मायूसी से वो घिरता गया,
मुफलिसी मे सब हुएँ नाकाम है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
