ग़ज़ल – रीता गुलाटी

 

जिंदगी मे यार कब रहबर मिले,

प्यार के प्यासे सभी दिलबर मिले।

 

लौटना था आपका साहिल से बस,

मैने कब सोचा मुझे ये भँवर मिले।

 

चाँद ढूँढे चाँदनी को अब किधर,

आज दोनो प्रेम से अम्बर मिले।

 

प्यार कितना वो लुटाता जान पर,

ख्याब मे अकसर वो जी भरकर मिले।

 

अब हिमाकत भी हुनर मे आ गयी,

जब मिले हम आपसे डर कर मिले।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

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