कभी ढूँढते थे तेरी आशिकी को,
तरसते रहे हैं तेरी बंदगी को।
नजर ना लगे अब मेरी जिंदगी को,
रहे प्रेम से हम जिये अब खुशी को।
हिज्र मैं सहूँ कैसे सोचा नही है,
समझना है मुश्किल बड़ा जिंदगी को।
पहेली बने लोग शातिर जमाना,
मुहब्बत न मानो कभी दिल्लगी को।
कही भी रहूँ मैं ये तन्हाई डसती,
जली याद तेरी सहूँ बेबसी को।
सितम जिंदगी सब पे करने लगी है,
नही चाहते अब सभी सादगी को।
घिरे हैं तुफां से, मरेगे कभी भी,
बचाये चलो हम तुफां से सभी को।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
