भीख माँगे रास्तों पर हाथ फैलाते मिले,
गोद मे बच्चे हैं उनके बोझा वो ढोते मिले।
मस्त होता आशिकी मे,ये जहाँ प्यारा लगे,
राह के पत्थर भी हमको,गीत गाते मिले।
पैर सूने से लगे हैं बिन महावर के दुल्हन,
जब लगे उसको महावर पैर हमको भाते मिले।
हाय कैसा ये चढ़ा है प्यार का देखो नशा,
डूब बैठे प्यार मे लोग पगलाते मिले।
आज तक देखी न ऐसी, मुफलिसी को आपने,
जूठ फैकी राह पर ,कुछ लोग वो खाते मिले।
आशियाना आज ढूँढे सिर छुपाते फिर रहे,
रात काली सर्द वाली सड़को पर सोते मिले।
बात दिल की यार किस किस को सुनाते रहे,
छोड़कर हमको सभी महफिल से अब जाते मिले।
– रीता गुलाटी.ऋतंभरा, चण्डीगढ़
