हम पर तीर अब ऩजरो के चलाने दे,
दिल मे खिलते फूलों को महकाने दे।
काली जुल्फों को मुखड़े पर आने दे,
अपने साये को इतना समझाने दे।
उसको खब़र न मैं खुशियों की चाबी हूँ,
उसके साये मे मुझको खो जाने दे।
महफिल तुमसे सजती बैठो पास जरा,
गीत मिलन के यारा अब तू गाने दे।
खुश्बू फूलों की महकी कलियां,
बैठी बगिया जूड़े मे फूल लगाने दे।
सपनें देखूँ बाँहो मे तुम हो मेरे।
इन आँखो को अब सच तू समझाने दे।
दूर हुआ क्यो? मुझसे बतला दे तू,
पास जरा मुझको अपने तू आने दे।
– रीता गुलाटी..ऋतंभरा, चण्डीगढ़
