लगा ली दर पे ये अर्जियाँ हैं,
बता दो मेरी क्या गलतियाँ हैं।
जमाने को दिखती खामियाँ हैं,
कि रौनकें होती बेटियाँ हैं।
महक उठी बेटियों से बगिया,
लगे वो उड़ती सी तितलियाँ है।
लगा ली माथे पे बिन्दिया भी,
सजी है कानो मे बालियाँ है।
बने हैं उँचे ये घर हमारे,
नये जमाने की खिड़कियाँ हैं।
हुआ है नभ मे घना अँधेरा,
चमक रही आज बिजलियाँ है।
तुम्ही से मेरी ये जिंदगी है,
भले फकत आज दूरियाँ हैं।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
