झुक न पाये मौत को स्वीकार की।
वो डरे ना आँख से खूँख्वार की।
जुल्म ढाते है जो अब बिन बात के,
क्या जरूरत देश को मक्कार की।
देश सारा जल रहा, चीत्कार की,
मार देगे भूमिका तैयार की।
खूबसूरत यार मेरा खूब है,
क्या निराली है अदा दिलदार की।
क्या गुनां बेमौत मारे सब गये?
वो सजा पाये थे वन दीदार की।
घूमने आये सभी काश्मीर में,
हाय मर कर जिंदगी दुश्वार की।
रो रहे बच्चे बड़े बिन बाप के,
घर चले कैसे अरे लाचार की।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा,चंडीगढ़
