ग़ज़ल – मणि अग्रवाल

 

जो करे ख़ुद की बड़ाई आदमी किस काम का है ।

सिर्फ़ करता है ढिठाई आदमी किस काम का है।।

 

अर्थ, पद का दंभ पाले सोचता है रात-दिन जो,

बस उसी में है ख़ुदाई आदमी किस काम का है।।

 

प्रेम तौले  जो  तुला में  देह का  सौंदर्य आँके,

भोग में ही वय बिताई आदमी किस काम का है।।

 

सत्य को समझे निरर्थक बस रहे छल की शरण में,

जोड़ता काली कमाई आदमी किस काम  का है ।।

 

भूलकर सारी मनुजता  तोड़ मैत्री  सभ्यता से,

दुष्टता से की सगाई आदमी किस काम का है ।।

 

निज हृदय की क्यारियों में आज तक बस द्वेष की ही,

पौध जिसने भी उगाई आदमी किस काम  का है ।।

 

घूमता मस्तक लगाकर आत्म श्लाघा का तिलक जो,

धूल में गरिमा मिलाई आदमी किस काम का है।।

– मणि अग्रवाल ‘मणिका’, देहरादून, उत्तराखंड

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