पास आकर ज़रा मुस्कुरा दीजिए।
सब्ज़ के बाग फिर से सज़ा दीजिए।
ख़्वाब आते रहे ख़्वाब जाते रहे,
नींद से अब मुझे तो ज़गा दीजिए।
प्यार की बात तुमने किया ही नहीं,
इस सज़ा की वज़ह तो बता दीजिए।
लिख रही हूँ ग़ज़ल अब तेरे नाम से,
भेजने के लिए दर पता दीजिए।
क्यों बदर-दर भटकते रहे तुम सदा,
ये हिकाऱत सभी को सुना दीजिए।
ज़ुल्म तुम तो गज़ब ढा रहे हो सनम,
आज ज़ाहिर करा वो ख़ता दीजिए।
दूर कर रंज़िशों को ए गीता ज़रा,
इश़्क का ज़ाम जी भर पिला दीजिए।
-डॉ गीता पांडेय अपराजिता,
रायबरेली, उत्तर प्रदेश
