दो घड़ी हम साथ बैठे मुस्कराने के लिए,
आ गई इल्ज़ाम दुनिया क्यों लगाने के लिए।
आपकी आँखें हैं मेरी ख़्वाबगाहें आजकल,
और पलकें शामियाना सर छुपाने के लिए।
चाहता है कौन जाना अपनी मिट्टी छोड़ कर,
आ गए हम छोड़ कर घर आब दाने के लिए।
आपके हर शेर को हमने लबों पर रख लिया,
बैठ कर तन्हाइयों में गुनगुनाने के लिए।
देखिए बेताब कितने ‘नेह’ के अरमान हैं,
दो दिलों के इस मिलन पर गीत गाने के लिए।
– कविता बिष्ट ‘नेह’, देहरादून, उत्तराखंड
