ग़ज़ल(हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

रोशनी चांद की बेअसर हो गई ।
ये सियासत लुटेरों का घर हो गई ।

गांव में जो नदी थी कहां गुम हुई ,
ज्ञात अब ये हुआ वो ढहर हो गई ।

गीत ग़ज़लें दुखी छंद से कह रहे ,
मंच पर चुटकुलों की कदर हो गई ।

रात में ख़्वाब उसके सताते रहे ,
जागने में मुझे दोपहर हो गई ।

मुक्त कविता ने इतना ठगा दोस्तो ,
छंद कारीगरी मुख़्तसर हो गई ।

देवता रोज पैदा हुए मुल्क में ,
आदमीयत मगर जानवर हो गई ।

उसको देखा टहलते हुए रात में ,
लोग समझे कि लो अब सहर हो गई ।

बोस बिस्मिल भगत देख रोने लगे ,
मज़हबी सोच क्यों कारगर हो गई ।

प्रेम के गीत ‘हलधर’ नहीं लिख सका ,
ज़िंदगी एक सूखा शजर हो गई ।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
(हिंदी के प्रख्यात कवि अश्वघोष जी की प्रथम पुण्य तिथि पर एक ग़ज़ल )

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