ग़जल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

 

आ गया वो रूह में मंज़र नहीं देखा गया ।

पूजते  पत्थर  रहे अंदर नहीं देखा गया ।

 

आत्म मंथन के सफ़र में देह से ऊपर उठा ,

पार गरदन के गया तो सर नहीं देखा गया ।

 

देह में वो साथ था पर हम ही लापरवाह थे ,

लोभ लालच ने ठगे  रहबर नहीं देखा गया ।

 

छोड़ कर भागा हमें तो लुट गयी आवारगी ,

चार कांधे ले चले फिर घर नहीं देखा गया ।

 

फूल मांटी में मिला तो देखकर हम रो पड़े ,

घाव कलियों के हुए नस्तर नहीं देखा गया ।

 

देखते ही देखते जब कारवां धूमिल हुआ ,

साठ से ऊपर हुए दफ्तर नहीं देखा गया ।

 

बात आयी देश के सम्मान की तो चल पड़े ,

लड़ सके जो हिंद से लश्कर नहीं देखा गया ।

 

मंच पर कविता नहीं अब भाषणों का राज है ,

इस तरह के मंच पर “हलधर”नहीं देखा गया ।

– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *