आ गया वो रूह में मंज़र नहीं देखा गया ।
पूजते पत्थर रहे अंदर नहीं देखा गया ।
आत्म मंथन के सफ़र में देह से ऊपर उठा ,
पार गरदन के गया तो सर नहीं देखा गया ।
देह में वो साथ था पर हम ही लापरवाह थे ,
लोभ लालच ने ठगे रहबर नहीं देखा गया ।
छोड़ कर भागा हमें तो लुट गयी आवारगी ,
चार कांधे ले चले फिर घर नहीं देखा गया ।
फूल मांटी में मिला तो देखकर हम रो पड़े ,
घाव कलियों के हुए नस्तर नहीं देखा गया ।
देखते ही देखते जब कारवां धूमिल हुआ ,
साठ से ऊपर हुए दफ्तर नहीं देखा गया ।
बात आयी देश के सम्मान की तो चल पड़े ,
लड़ सके जो हिंद से लश्कर नहीं देखा गया ।
मंच पर कविता नहीं अब भाषणों का राज है ,
इस तरह के मंच पर “हलधर”नहीं देखा गया ।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
