गजल – मधु शुक्ला

 

ऋण हमें अरि के चुकाने हैं बहुत,

ख्वाब अपनों के‌ सजाने हैं बहुत।

 

माँग सूनी माँ बहन की कह रही ,

खार अरि उर में चुभाने हैं बहुत।

 

दीनता से शत्रु बच सकता नहीं ,

पाठ नव उसको पढ़ाने हैं बहुत।

 

मित्रता में सेंध जिसका शौक है,

स्वप्न ‘मधु’ उसके मिटाने हैं बहुत।

 

ऋण नहीं रखते कभी  हम शत्रु का ,

छीन कर जज़्बात लाने हैं बहुत।

— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश

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