ऋण हमें अरि के चुकाने हैं बहुत,
ख्वाब अपनों के सजाने हैं बहुत।
माँग सूनी माँ बहन की कह रही ,
खार अरि उर में चुभाने हैं बहुत।
दीनता से शत्रु बच सकता नहीं ,
पाठ नव उसको पढ़ाने हैं बहुत।
मित्रता में सेंध जिसका शौक है,
स्वप्न ‘मधु’ उसके मिटाने हैं बहुत।
ऋण नहीं रखते कभी हम शत्रु का ,
छीन कर जज़्बात लाने हैं बहुत।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
