दूर रहा सीमा भारत से सेना के जोर पांव उखड़ जाई।
खेल मत खेला आतंक के खूनी चाल सब बिगड़ जाई।
जब जब रचबा षडयंत्र पत्थरबाजी औरी घुसपैठी के।
चाल उल्टा पड़ी मार अईसन आदत सब सुधर जाई।
खून बहवला निर्दोषन के बदला खून चुकावे के पड़ल।
जर्रा जर्रा मिली माटी गर्दा गर्दा गुरूर हवा बिखर जाई।
भूमि भारत जलवा निराला अलबेला एकर सानी नइखे।
बड़ बड़ तिसमार ख़ां टकराई जे हमसे उ सुधर जाई।
सौ सौ बार बा नमन भारती भारत महान अपरंपार के।
ऊंचा सदा रही झंडा हमार तिरंगा गगन में फहर जाई।
– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो,
झारखंड , मॉब.9955509286
