गंगा नदी – सविता सिंह

 

हे! नदी गंगा नदी तुझको नमन

तेरे चरणों में करें अर्पित सुमन।

 

छोड़ शिव को तू धरा पर आ रही

तू मचलती तू उछलती जा रही।

चोट इतना तू बता मां क्यों सहे,

तू तो औरों के लिए ही है बहे।

ए नदी गंगा नदी तुझको नमन,

तेरे चरणों में करूं अर्पित सुमन।

 

मोक्ष का भी द्वार तुझसे ही खुले,

पी ले जो दो बूँद फिर वह तो जी ले।

कर रहे माँ सब तेरी ही आरती,

बूँद से अपने सभी को तारती।

हे! नदी गंगा नदी तुझको नमन,

तेरे चरणों में करें अर्पित सुमन।

 

पर यह गंगा लगती थोड़ी सी उदास,

जूझती है खुद से थोड़ी  बदहवास।

हम करें अब सब मिलकर यह प्रयास,

लुप्त ना  हो जाये इस जल की  मिठास।

हे! नदी गंगा नदी तुझको नमन,

तेरे चरणों में करें अर्पित सुमन।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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