खुशी मुझको भी हो रही है,
कि तुमने भी समझ लिया है,
जीवन का ध्येय,
और उत्सुक है तुम्हारे नेत्र,
अपने लक्ष्य की तस्वीर देखने को,
उतावले हैं तुम्हारे कदम और हाथ,
अपने श्रेष्ठ लक्ष्य को पाने को।
खुशी मुझको भी हो रही है,
तुम बेखबर हो,
अबोध हो तुम,
कि संसार किसको श्रेष्ठ मानता है,
तुम उठा रहे हो वो साधन,
उनकी महत्ता कितनी है,
तुम अनभिज्ञ हो,
लेकिन पूरी लगन से,
तुम परिश्रम करके,
तुम पसीना बहा रहे हो।
खुशी मुझको भी हो रही है,
हे सरस्वती के पुत्रों,
तुम उज्ज्वल हो,
जग उज्ज्वल हो,
तुम मानते हो अपने दोष भी,
यह क्या कम है,
तुम्हारी समझदारी और ईमानदारी।
खुशी मुझको भी हो रही है————।।
– गुरुदीन वर्मा.आज़ाद
तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)
