क्षण भंगुर – प्रदीप सहारे

 

उत्साह-उमंग,

जीवन का अंग।

खुशियों की बौछार,

साथ परिवार।

किसी का सपना,

किसी का नवजीवन।

देखना है एक बार,

कहते हैं “नंदनवन”।

खुशी, मुस्कराहट चेहरे पर,

देख बर्फ की सफेद चादर।

वृक्ष भी हरे-भरे घने,

सब देख कहे फिर मन –

“ईश्वर, तेरी महिमा अनंत”।

ना जाने कहां से,

आ गए आतंकवादी।

चारों ओर गोलियों की बौछार,

सब हताश और लाचार।

शांत वादी में कोहराम-शोर,

भागने लगे चारों ओर।

रक्तरंजित होने लगी

बर्फ की सफेद चादर।

भय, पीड़ा, दुःख, मजबूर,

होने लगे अपने अपनों से दूर।

अश्क बहे अनवरत,

किसे कहें, किसका कसूर?

सब जीवन है — क्षणभंगुर ।

– प्रदीप सहारे,  नागपुर, महाराष्ट्र

मोबाईल -7016700769

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