कि मैं एकलौती नहीं?
हर बेटी, हर बहन, हर माँ,
इस दोहरी सोच की बेड़ियों में जकड़ी है,
जो प्रेम से पहले, संपत्ति से तौली जाती है।
कभी देखा है,
उस गुलाब की पंखुड़ी को,
जो कांटों के बीच खड़ी,
अपनी महक में खोई रहती है,
पर किसी की चाहत का भार
अपने नाजुक कंधों पर लिए जीती है।
मैं भी तो वही हूँ,
एक नाजुक सपना,
जिसे रिश्तों की रेशमी डोर में,
सोने-चाँदी के बंधनों में जकड़ दिया गया।
पर अब,
मुझे खुद की महक से मिलना है,
इस दोहरी सोच से परे,
अपनी पहचान को पाना है।
अब मुझे उगना है,
उन पत्तों की तरह,
जो आंधियों से लड़ते हैं,
उन लहरों की तरह,
जो चट्टानों से टकराती हैं,
उन पंखुड़ियों की तरह,
जो कांटों के बीच भी मुस्कुराती हैं।
– प्रियंका सौरभ, 333, परी वाटिका,
कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी)
भिवानी, हरियाणा – 127045,
