कुर्सियों से उठते सवाल – प्रियंका सौरभ

 

कभी शपथ थी बदलाव की,

आज सवाल बन गई है वफ़ादारी।

कुर्सियाँ सुनती हैं अब थकी आहें,

कलमों से गिरती है लाचारी।

 

जिन हाथों में था हुक़्म का उजाला,

वहीं आज बुझती उम्मीदें थामे।

सिस्टम ने जकड़ा ईमानदारों को,

राजनीति ने बाँधे हाथ उनके आमने-सामने।

 

आदेशों की जंजीर में जकड़ी सोच,

स्वायत्तता की लाशें ढोती है हर चौक।

जहाँ निर्णय स्वतंत्र थे कल,

आज चापलूसी करती है हलचल।

 

इस्तीफ़े गूंजते नहीं, वे फुसफुसाते हैं,

तंत्र के पतन की ख़बर सुनाते हैं।

जो उठे थे जनता की सेवा को,

वे अब स्वयं अपनी असहायता पर रोते हैं।

 

यह चुप्पी साधारण नहीं, यह चेतावनी है,

कि यदि न जागे, तो राजकाज बस एक कंपन बन रह जाएगी।

शासन वही टिकता है, जहाँ निष्ठा को मरने न दिया जाए,

वरना सिंहासन पर बैठेंगे केवल कटपुतलियाँ —

और कोई पूछने वाला न आए।

– प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर,

हिसार (हरियाणा)-127045 (मो.) 7015375570

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *