मैं कितना विवस हो चला हू,
कि औंधे मुह ही गिर पड़ा हू
शक्ति अब बाकी कुछ नहीं है
उलझनों में उलझा पड़ा हू।।
ताकता हू जिधर भी जब तब
मिल रहे लाचार सब के सब
बौना पड़ा मिला मानवता
ऑंसुओं में डूबे सब के सब।।
टूट गया वह दर्पण निर्मम
कैसा पतझड़ कैसा सावन
आज कहा मेरा अपनापन
तप्त रहा तम से अन्तरमन।।
अन्तरमन के अन्तरमन में
जलमय सागर का उर जलता
परिचय सब का मिट जाएगा
अमर्ष का ज्वाला कण कहता।।
तुम केवल इतना बतला दो
आखिर मेरी पहचान क्या है
प्राण के बढ़ते कर्म-रथ पर
तात! विजय पथ निशान क्या है ?
– नीलकान्त सिंह नील, बेगूसराय, बिहार
