कांपेला बदनवा (भोजपुरी) – श्याम कुंवर भारती

रतिया जगवले मोर हो सजनवा,

थर थर कांपेला जोर हो बदनवा।

 

सुनी के सजना के बतिया ,

उड़ल मोर निंदिया रतिया।

ढर-ढर बहे लोर हो नयनवा,

थर-थर कांपेला मोर हो बदनवा।

 

अबहीन बाड़े मोरी बाली उमरिया,

पिया कहे चला ससुरा की ओरिया।

छूटी जाई नईहर मोर हो भवनवा।

थर थर काँपेला मोर हो बदनवा।

 

नईहर में कुछऊ नाही सिखली,

सखियन संग खेल बितवली।

पपवा के गंठरी बटोर हो नदनवा।

थर थर काँपेला मोर हो बदनवा।

 

पियवा के संग दगा हम कईलीं।

देवरा के मोह सगा हम भईली।

दगिया लागल अँचरा कोर हो जमनवा।

थर थर कांपेला मोर हो बदनवा।

 

गाई निर्गुणवा कहे भारती भोजपुरी,

आइल समइया अब जाए के यमपुरी।

संखिया सजा दा पोर पोर हो उबटनवा।

थर थर काँपेला मोर हो बदनवा।

– श्याम कुंवर भारती( राजभर) बोकारो, झारखण्ड

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