शिव की जटाओं संग ,गिर की लटाओं संग ।
मात पार्वती संग ,सोई थी माँ की लली ।।
भागीरथ ने बुलाई ,सिन्धु से मिलन आई ।
चट्टानों से टकराई ,द्रुत गति से चली ।।
गिर ने विरोध किया ,मात गृह छोड़ दिया ।
मन में बसे थे पिया ,चल पड़ी एकली ।।
कंकर को साथ लिया ,शंकर को छोड़ दिया ।
मानव को मोक्ष दिया ,छोड़ मात की गली ।।
चली गहराती हुई ,खूब इठलाती हुई ।
धरा को सजाती हुई ,मैं रूहानी हो गई ।।
खेत व उद्यान दिये ,दूब के मैदान दिये ।
खूब धन-धान दिये ,महारानी हो गई ।।
मात मोहपास छोड़ा,शिव का निवास छोड़ा ।
नगपति खास छोड़ा,मैं सयानी हो गई ।।
अँखियाँ बचाती आयी,छिपती छिपाती आयी ।
ओषधी की निधि लायी,गंगा रानी हो गई ।।
पंडितों ने धंधा किया,उद्धोगों ने गंदा किया ।
नेताओं ने माल पिया ,नहीं मैं शुद्ध हुई ।।
पथ किया टेड़ा मेडा,बांध डैम का बखेड़ा ।
गंदे नाले को उलेड़ा,गति अवरुद्ध हुई ।।
कवि को बताया दुःख, मानस ने छीना सुख ।
मैं भी हो गई बीमुख , अब मैं क्रुद्ध हुई ।।
गंदगी का हुआ वास , सिंधु से बुझेगी प्यास ।
कैसे जाऊं पिया पास,मैल से अशुद्ध हुई ।।
यदि मूंद लूंगी नैन,दिन में भी होगी रैन ।
धरा पे मिले न चैन , ऐसी मेरी चाल है ।।
मुट्ठियों में तीनों काल,पैरों के नीचे पाताल।
बाप मेरा महाकाल,रूप बिकराल है ।।
डालूं सही दृष्टि जहां ,हंसती है सृष्टि वहां ।
दृष्टि यदि फेर लूं तो बाढ़ या अकाल है ।।
यदि हुई पथ भ्रष्ट , कर दूंगी भूमि नष्ट ।
भोगने पड़ेंगे कष्ट,कल का सवाल है ।।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
