कविता (स्वाद) – जसवीर सिंह हलधर

 

पीतल का स्वाद उस ठठेरे को पता नहीं ,

जिसने जीवन भर पीतल को हथोड़े से पीट वर्तन बनाए हैं ।

यह स्वाद उस सैनिक को ही पता है ,

जिसने जीवन भर पीतल को अपने कंधों पर सजाया है ,

युद्ध में यही पीतल जिसकी छाती में समाया है ।

 

सोने का स्वाद भी सुनार के वजाय उस किशोरी को ही पता है ,

जिसने उसे धारण करने के लिए,

अपने नाक कान के भेदन के दर्द को अपनाया है ।

 

लोहे का स्वाद लोहार के बजाय उस घोड़े को ही पता है ,

जिसने जीवन भर लोहा चबाया है,

या उस योद्धा को पता है जिसकी छाती में भाला समाया है ,

या उस किसान को पता है जिसने,

फावड़ा,हंसिये ,कुदाल के साथ जीवन बिताया है ।

 

अन्न का स्वाद भी उस किसान को पता,

नहीं जिसने इसे उगाया ,

यह स्वाद उस माँ को पता है जिसने,

बच्चों की दो रोटी के लिए अपना सब कुछ लुटाया है ।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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