पीतल का स्वाद उस ठठेरे को पता नहीं ,
जिसने जीवन भर पीतल को हथोड़े से पीट वर्तन बनाए हैं ।
यह स्वाद उस सैनिक को ही पता है ,
जिसने जीवन भर पीतल को अपने कंधों पर सजाया है ,
युद्ध में यही पीतल जिसकी छाती में समाया है ।
सोने का स्वाद भी सुनार के वजाय उस किशोरी को ही पता है ,
जिसने उसे धारण करने के लिए,
अपने नाक कान के भेदन के दर्द को अपनाया है ।
लोहे का स्वाद लोहार के बजाय उस घोड़े को ही पता है ,
जिसने जीवन भर लोहा चबाया है,
या उस योद्धा को पता है जिसकी छाती में भाला समाया है ,
या उस किसान को पता है जिसने,
फावड़ा,हंसिये ,कुदाल के साथ जीवन बिताया है ।
अन्न का स्वाद भी उस किसान को पता,
नहीं जिसने इसे उगाया ,
यह स्वाद उस माँ को पता है जिसने,
बच्चों की दो रोटी के लिए अपना सब कुछ लुटाया है ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
