कविता – ज्योती कुमारी

आधुनिकता की इस तेज़ रफ़्तार में अब ऐसा चलन है,

कि चंदा मामा भी दूर नहीं — बस “टूर” भर का सफ़र है।

 

शरद पूर्णिमा पर खीर का भोग आज भी लगता है,

पर उसका स्वाद अब घर की रसोई से ज़्यादा

मोबाइल कैमरे की तस्वीरों में बसता है।

 

बचपन से हमने चाँद की कहानियाँ खूब सुनीं,

पर आज की पीढ़ी चाँद को कहानी नहीं,

जी.के. का सवाल मानकर पढ़ती है—

“चाँद पर जाने वाले पहले भारतीय कौन थे?”

 

कभी बरामदे में बैठकर दादी की गोद में

आसमान के तारे गिना करते थे,

अब बच्चे ऐप में तारामंडल ढूँढते हैं

और स्क्रीन के उजाले में ही रातें कटती हैं।

 

कहानी, लोकगीत, लोककथाएँ—

सब कहीं पीछे छूटने लगे हैं,

तकनीक की चकाचौंध में

रिश्तों के धागे भी ढीले पड़ने लगे हैं।

 

पर सोचती हूँ—

क्या आधुनिक होना गलत है?

नहीं…

गलत तब है जब हम जड़ों को भूल जाते हैं।

 

आधुनिकता अच्छी है,

पर अपनी परंपरा की खुशबू के बिना

यह आधी-सी लगती है।

 

आओ, नए ज़माने के साथ बढ़ें,

पर अपने बचपन की धरोहर भी बचाए रखें।

– ज्योती कुमारी बरनवाल, नवादा, (बिहार)

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