कविता (जिहाद हो) – जसवीर सिंह हलधर

महा विकास के लिए , जिहाद हो जिहाद हो ।
नए प्रकाश के लिए,जिहाद हो जिहाद हो ।।

जिहाद हो कि देश से, कुरीति का विनाश हो ।
जिहाद हो कि अर्थ में , नया मुकाम ख़ास हो ।।
जिहाद हो कि अन्न का , अभाव दूर हो सके ।
जिहाद हो कि भूख का प्रभाव दूर हो सके ।।
जिहाद हो कि व्याधियों की पूर्ण रोकथाम हो ।
जिहाद हो कि रोज़गार का भी इंतज़ाम हो ।।
समाज के उठान को , जिहाद हो जिहाद हो ।
महान गीत गान को , जिहाद हो जिहाद हो ।।1

जिहाद हो कि प्यार प्रीत, और अपनत्व हो ।
जिहाद हो कि भारती के, मंत्र में घनत्व हो ।।
जिहाद हो कि देश का, जवान शृंग चढ़ सके ।
जिहाद हो कि देश का, किसान और बढ़ सके ।।
जिहाद हो कि राष्ट्र गान, आरती का रूप हो ।
जिहाद हो कि संविधान, ही सभी का भूप हो ।।
सुरम्य शांति के लिए , जिहाद हो जिहाद हो ।
महान क्रांति के लिए , जिहाद हो जिहाद हो ।।
-जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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