कविता – जसवीर सिंह हलधर

जुड़े प्रकृति के संग ,कला के साधन सारे ।

इंद्र धनुष के रंग , दीखते न्यारे न्यारे ।।

होता यही स्वभाव , प्रकृति के रूप निराले ।

मौसम के बदलाव ,सर्द ऋतु बादल काले ।।

 

भागीरथी पुनीत, ललक बनने की गंगा ।

बहन निभाये प्रीत , अलकनंदा मन चंगा ।।

पिंडर करती शोर , बहे कैसे इठलाती ।

मंदाकिनि चितचोर , मिली उसमें लहराती ।।

 

मिला हमें यह ज्ञान ,करें नदियों की रक्षा ।

हो गंगा सम्मान , मिली वेदों से शिक्षा ।।

जीवन इसके हाथ ,चली गंगा इठलाती ।

उगें फूल फल साथ ,पेट की आग बुझाती ।।

 

पूजा करते वृक्ष , यहां अब भी वनवासी ।

प्रश्न पूछता यक्ष , कथा द्वापर की खासी ।।

मेरा उजला रूप , भोग ले आ हमजोली ।

नदी किनारे धूप , आज “हलधर” से बोली ।।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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