जुड़े प्रकृति के संग ,कला के साधन सारे ।
इंद्र धनुष के रंग , दीखते न्यारे न्यारे ।।
होता यही स्वभाव , प्रकृति के रूप निराले ।
मौसम के बदलाव ,सर्द ऋतु बादल काले ।।
भागीरथी पुनीत, ललक बनने की गंगा ।
बहन निभाये प्रीत , अलकनंदा मन चंगा ।।
पिंडर करती शोर , बहे कैसे इठलाती ।
मंदाकिनि चितचोर , मिली उसमें लहराती ।।
मिला हमें यह ज्ञान ,करें नदियों की रक्षा ।
हो गंगा सम्मान , मिली वेदों से शिक्षा ।।
जीवन इसके हाथ ,चली गंगा इठलाती ।
उगें फूल फल साथ ,पेट की आग बुझाती ।।
पूजा करते वृक्ष , यहां अब भी वनवासी ।
प्रश्न पूछता यक्ष , कथा द्वापर की खासी ।।
मेरा उजला रूप , भोग ले आ हमजोली ।
नदी किनारे धूप , आज “हलधर” से बोली ।।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
