कविता (कल्कि अवतार) – जसवीर सिंह हलधर

वो ही स्वरूप वो ही अरूप , उसके रुपों का नहीं अंत।
वो वंध मोक्ष वो ही रहस्य, उसकी परिधी हैं दिग्दिगंत।।
वो ही रक्षक वो ही भक्षक, वो ही मानव का महा कंत।
वो ज्ञान बुद्धि वो ही विवेक , उसकी सीमाएं हैं अनंत।।1

वो ही कर्ता वो ही धर्ता , वो ही माया वो राग द्वेष ।
वो काल हस्त वो उदय अस्त,वो पूर्ण और भग्नावशेष ।।
वो कोमल है वो ही कठोर, वो ही शीतल वो अग्निवेश।
उसमें ब्रह्माण्ड बसा पूरा , उससे बाहर कुछ नहीं शेष।।2

उसमें बहती सारी नदियां ,वो ही मरुथल वो महा सिंधु ।
वो ही माता है पिता वही ,वो ही प्रिया वो मित्र बंधु ।।
उसमें ही व्योम समाया है , वो ही दिनकर नक्षत्र इंदु।
वो ही जड़ है वो ही चेतन, वो ही दोनों का मिलन बिंदु।।3

उसमें वैराग्य गृहस्थ पलते, उससे मुखरित हैं ध्यान योग ।
उसमें संन्यास पनपता है , पलते उसमें आलस्य भोग।।
उससे ही मिलता स्वास्थ्य लाभ, उससे ही मिलते विविध रोग।
वो खुशियों का भंडार गृह, उसमें ही बसता महासोग।।4

सतयुग में नरसिंह रूप धरा, त्रेता में वो ही बना राम ।
द्वापर में गोपीनाथ बना, कलयुग में होगा कल्कि नाम।।
उसका प्रवाह अनल जैसा ,जल थल उसको करते प्रणाम।
वो महाशून्य वो ही विराट, भारत में होगा पुण्य धाम।।5

जब कलयुग में इस धरती पर,बढ़ जाएगा अति अनाचार।
महिलाओं का शोषण होगा, बच्चों से होगा व्यभिचार।।
साकार रूप धर आयेगा ,जिसको माने हम निराकार।
होगा अवतार कल्कि नामक,आने वाला है समाचार।।6

कुछ वेद पुराण बताते हैं , गंगा तट पर होगा निवास।
संभल नामक है नगर यहां, हरिहर मंदिर पहचान ख़ास।।
तोड़ा मुगलों ने मंदिर को ,कर डाला मस्ज़िद का विकास।
अब जाग उठा सोया हिंदू, मस्ज़िद का होगा सर्वनाश।।7
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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