कभी – रुचि मित्तल

 

तेरी साँसों की नमी

मेरे खयालों में भीग जाती है

जैसे बरसात

बिना बादल के उतर आए

दिल की छत पर।

 

तू पास नहीं होता

पर हर साज़ पे

तेरा ही नाम गूंजता है

कभी राग बनकर

कभी ख़ामोशी की तान में

तू जब भी याद आता है

मैं चाय में शक्कर कम कर देती हूँ

क्योंकि…

तेरी यादें बहुत मीठी हैं

बहुत ज़्यादा

हम कभी मिले नहीं

फिर भी तुझसे बिछड़ गयी हूँ

कई बार

हर बार थोड़ा और टूट कर

थोड़ा और जुड़ कर।

 

तू जिस रोज़ मेरी रूह को छू गया था

वो दिन अब भी सांस लेता है

मेरे भीतर कहीं

धीरे-धीरे

जैसे तू

मेरी धड़कनों से बात करता हो

बिना आवाज़ किए।

 

रूहानी मुहब्बत में

जिस्म नहीं जलते

बस रूहें

चुपचाप रोशनी ओढ़ लेती हैं।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *